Friday, April 12, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

फिर भी, महंगाई नियंत्रण में है. सरकार की ओर से इन्फ़्रास्ट्रक्चर और लोक निर्माण में ख़र्च करने से अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है. इस वित्त वर्ष में जीडीपी की रफ़्तार 6.8 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई गई है.
मगर यह बात भी तथ्य है कि अगर लाखों लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालना है तो भारत की जीडीपी को 7 फ़ीसदी से अधिक रफ़्तार से आगे बढ़ना होगा.
मोदी ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में बदलाव लाने की प्रक्रिया प्रगति पर है. ये चुनाव तय करेंगे कि इसके लिए जनता उन्हें और समय देने के लिए मूड में है या नहीं.
8. जनवाद पर चल रही हैं पार्टियां
अर्थशास्त्री राथिन रॉय कहते हैं कि भारत 'विकास पर ध्यान
दुर्भाग्य से राष्ट्रवाद के अति प्रचार ने कट्टरपंथी दक्षिणपंथी समूहों को गाय की तस्करी करने के संदेह में मुस्लिमों की लिंचिंग करने के लिए प्रोत्साहित कर दिया है.
हिंदू गाय को पवित्र मानते हैं. पशुवध रोधी क़ानूनों को कड़ाई से लागू किए जाने के कारण गाय भी ध्रुवीकरण करने वाली पशु बन गई है.
कट्टरपंथी हिंदूवाद के आलोचकों को देशद्रोही कहा जा रहा है. असहमति जताने वालों को आंखें दिखाई जाती हैं.
बहुत से लोग कहते हैं कि भारत के 17 करोड़ मुसलमान 'अदृश्य' अल्पसंख्यक बन गए हैं. निचले सदन में बीजेपी का कोई सांसद मुसलमान नहीं है. 2014 में इसने सात मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे और वे सभी हार गए थे.
भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में भारतीय सुरक्षा बलों पर हुए घातक आत्मघाती हमले के बाद फ़रवरी महीने के अंत में भारत और पाकिस्तान की ओर से एक-दूसरे पर बमबारी की गई. इससे कथित राष्ट्रवाद की भावना पैदा हो गई.
मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान स्थित चरमपंथी समूहों ने अगर भारत पर एक भी हमला किया या करवाया तो बदले की कार्रवाई से पीछे नहीं हटा जाएगा.
यह स्पष्ट हो गया था कि मोदी राष्ट्रीय सुरक्षा को अपने चुनाव प्रचार अभियान का आधार बनाएंगे. हालांकि यह काम करेगा या नहीं, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. विपक्ष अभी तक इस मामले में कोई काट लेकर नहीं आ पाया है.
क्या राष्ट्रवादी उबाल में इतनी ताक़त है कि वह बाक़ी मुद्दों को गौण साबित करते हुए मोदी के लिए वोट खींच पाएगा?
देने वाले देश से मुआवज़ा देने वाले देश' की ओर बढ़ रहा है, जहां सरकारें अपनी व्यवस्था की कमियों को छिपाने के लिए जनता की जेबों में नक़दी भर रही हैं.
नतीजा है- पॉप्युलिज़म यानी जनता को लुभाने की होड़.
मोदी सरकार ने किसानों के लिए डायरेक्ट कैश ट्रांसफ़र और क़र्ज़ माफ़ी का एलान किया था. तथाकथित ऊंची जातियों और अन्य धर्मों के लोगों के नौकरियों में आरक्षण का भी वादा किया.
उधर राहुल गांधी ने ऐसी योजना का वादा किया है जिसके तहत सरकार बनने पर वह ग़रीबों की न्यूनतम आय तय करेंगे.
अन्य लोग मतदाताओं को टीवी सेट और लैपटॉप जैसी चीज़ें देने के वादे से लुभा रहे हैं. हालांकि इस बात का कोई साफ़ प्रमाण नहीं है कि इस तरह से प्रलोभन देने से वोट मिलते ही हैं.
9. राष्ट्रवाद बदल सकता है गेम
आलोचकों का कहना है कि मोदी के राष्ट्रवाद के प्रदर्शन और उनकी पार्टी की बहुसंख्यक राजनीति के कारण भारत गहरे विभाजन वाले बेचैन देश में बदल गया है.
हालांकि उनके समर्थकों का कहना है कि मोदी ने अपने आधार को मज़बूत किया है और उसमें ऊर्जा भरी है. वे मानते हैं कि राजनीतिक हिंदुत्व को लेकर शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि भारत 'एक तरह से हिंदुओं का राष्ट्र ही तो है.'
2014 में बीजेपी ने यहां 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल की थी. पिछली बार मोदी के करिश्मे और उनकी पार्टी द्वारा बनाए जातियों के इंद्रधनुषी गठजोड़ ने ही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों को पराजित करने में भूमिका निभाई थी.
बहुजन समाज पार्टी यानी बीएसपी की प्रमुख मायावती हैं जो कि लाखों दलितों की आदर्श हैं. राज्य की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी क़रीब 20 फ़ीसदी है.
अब मायावती ने अपनी धुर विरोधी पार्टी समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया है जो आंशिक रूप से समाजवादी हैं. दोनों को उम्मीद है कि वे 50 सीटें जीतकर बीजेपी को फिर दिल्ली की सत्ता पर आने से रोक देंगे.
यह एक अवसर को देखकर बनाया गया गठबंधन है जिसमें कड़वी दुश्मनी को मिठास भरी दोस्ती में बदल दिया गया. मगर यह गठजोड़ उत्तर प्रदेश में बीजेपी को झटका दे सकता है. बीजेपी की उम्मीदें अब मोदी पर ही टिकी हैं कि कैसे वह इस गठबंधन को बेअसर करते हैं.

Tuesday, April 2, 2019

तेज प्रताप को परिवार, पत्नी और आरजेडी से विद्रोह कर क्या मिला

लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने सोमवार शाम पटना में एक प्रेस कांफ्रेंस करके लालू राबड़ी मोर्चा का गठन का एलान किया.
उन्होंने जहानाबाद और शिवहर से अपने उम्मीदवार खड़े करने की घोषणा कर दी. उन्होंने ये भी बताया कि शिवहर से अंगेश कुमार और जहानाबाद से चंद्र प्रकाश उनके मोर्चे के उम्मीदवार हैं.
उन्होंने ये भी कहा कि सारण की सीट लालू की पारंपरिक सीट रही है और वे अपनी माता राबड़ी देवी से अनुरोध कर रहे हैं कि वे वहां से चुनाव लड़ें, ऐसा नहीं होने पर उन्होंने वहां से खुद को चुनाव मैदान में उतारने की बात कही.
सारण से आरजेडी ने तेज प्रताप के ससुर चंद्रिका राय को उम्मीदवार बनाया है.
हालांकि जब पत्रकारों ने तेज प्रताप यादव से पूछा कि क्या वे आरजेडी से अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहा कि आरजेडी और लालू राबड़ी मोर्चा एक ही है और तेजस्वी उनके अर्जुन हैं.
दोनों बेटों को राजनीति में पिता लालू प्रसाद यादव ने 2013 में पटना की परिवर्तन रैली में लॉन्च किया था. मतलब न दोनों की उम्र ज़्यादा है और न ही राजनीति में आए ज़्यादा दिन हुए हैं.
लालू प्रसाद के परिवार को क़रीब से नज़र रखने वाले लोग इस बात को बड़े भरोसे से कहते हैं कि तेजस्वी के प्रति लालू का स्नेह तेजप्रताप की तुलना में हमेशा से ज़्यादा रहा है.
वहीं मां राबड़ी देवी ने इस बात को हमेशा सुनिश्चित करने की कोशिश की कि तेज प्रताप को ऐसा महसूस ना हो कि उसकी उपेक्षा हो रही है.
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी और तेज प्रताप चुनावी मैदान में उतरे और दोनों ने जीत दर्ज की. तेजस्वी बिहार के उपमुख्यमंत्री बने और तेज प्रताप स्वास्थ्य मंत्री. कहा जाता है कि लालू के इस फ़ैसले से तेज प्रताप ख़ुश नहीं थे और उसके बाद से ही उनके मन में उपेक्षा का भाव घर करने लगा.
लालू प्रसाद यादव जेल में हैं और दोनों भाइयों के रिश्तों कड़वाहट सतह पर आ गई है. तेज प्रताप ने छात्र आरजेडी के संरक्षक पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.
अपने पसंद के व्यक्तियों को लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल का टिकट नहीं मिलने के कारण तेज प्रताप ने ऐसा किया है. इस्तीफ़ा देने के बाद तेज प्रताप ने ट्वीट कर कहा- नादान हैं वो जो उन्हें नादान समझते हैं.
स्थिति तब और बिगड़ गई जब तेजस्वी यादव ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर महागठबंधन के उम्मीदवारों की घोषणा की. आरजेडी की इस घोषणा में बताया गया कि पूर्व मंत्री चंद्रिका राय सारण से बीजेपी के राजीव प्रताप रूड़ी को चुनौती देंगे.
कहा जा रहा है कि चंद्रिका राय को टिकट मिलना तेज प्रताप के लिए एक और झटका था. चंद्रिका राय तेज प्रताप के ससुर हैं. तेज प्रताप ने एश्वर्या राय से तलाक़ की अर्जी दे रखी है.
चंद्रिका राय का नाम सार्वजनिक होते ही अफ़वाह उड़ने लगी कि तेज प्रताप सारण अपने ससुर के ख़िलाफ़ निर्दलीय उम्मीदवार को तौर पर चुनाव लड़ेंगे. हालांकि चंद्रिका राय ने बीबीसी से कहा कि उनके दामाद सारण में उनके ख़िलाफ़ चुनाव नहीं लड़ेंगे. बाद में तेज प्रताप ने भी कहा कि कौन कहां से चुनाव लड़ रहा है यह उनकी चिंता नहीं है.
हालांकि तेज प्रताप ने शिवहर और जहानाबाद से दो प्रत्याशियों को उतारा है. शिवहर से आरजेडी ने अभी तक उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है. दोनों भाइयों में मतभेद और विवादों पर तेजस्वी बोलने से बचते हैं. पिछले हफ़्ते शुक्रवार को पत्रकारों ने दोनों भाइयों में कलह पर सवाल पूछा तो तेजस्वी का जवाब था, ''आपको जो कहना है कहिए. इससे मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. आप अपनी टीआरपी के लिए ये सब कर रहे हैं.''
चंद्रिका राय का कहना है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. वो कहते हैं, ''जहानाबाद और शिवहर की सीटों को लेकर भी कोई विवाद नहीं है. सारी चीज़ें कुछ दिनों में ठीक हो जाएंगी. परिवार में विवाद का असर राजनीति पर नहीं पड़ेगा. हम मिलकर काम कर रहे हैं और आगे भी ऐसा ही होगा.''
राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव भी ऐसा ही मानते हैं. उनका भी यही कहना है कि आने वाले कुछ दिनों में सब कुछ ठीक हो जाएगा. तेजप्रताप को स्टार प्रचारक नहीं बनाए पर शक्ति यादव कहते हैं कि यह पार्टी का फ़ैसला है.
तेजस्वी अब लालू प्रसाद यादव के स्वाभाविक उत्तराधिकार के रूप में उभर चुके हैं.
आरजेडी के एक और प्रवक्ता का कहना है कि तेजस्वी के स्वाभाविक उत्तारधिकार के रूप में स्थापित होने से तेज प्रताप सहज नहीं हैं. वो कहते हैं, ''उनके मन में इस बात की कसक है कि वो बड़े हैं इसलिए ये ज़िम्मेदारी उन्हें मिलनी चाहिए थी. लेकिन उनको ये बात भी समझनी चाहिए कि नेतृत्व क्षमता उम्र के आधार पर नहीं आती है. लालू जी ने जो फ़ैसला लिया वो किसी से भेदभाव पूर्ण नहीं था बल्कि विवेकपूर्ण फ़ैसला था.''
उस प्रवक्ता ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, ''तेज प्रताप की शादी भी लालू परिवार के लिए एक तरह मुसीबत बन गई. अगर हैसियत के लिहाज़ से देखें तो यह बेमेल शादी नहीं है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय तेज प्रताप की पत्नी एश्वर्या के बाबा थे. वो कांग्रेस के बड़े नेता थे और यह परिवार काफ़ी संपन्न रहा है. इस लिहाज से ये शादी बेमेल नहीं है.''
वो कहते हैं, ''अगर पढ़ाई के लिहाज़ से देखें तो ये शादी बेमेल ज़रूर लगती. तेजप्रताप कॉलेज ड्रॉप आउट हैं जबकि एश्वर्या ने एमबीए किया है. दूसरी बात यह है कि चंद्रिका राय लालू प्रसाद यादव के चेले रहे हैं. तेज प्रताप को बख़ूबी पता होगा कि शादी से पहले चंद्रिका राय की उनके घर में कितनी तवज्जो थी.''
''जब शादी हुई तो रिश्ते बदले. लेकिन तेज प्रताप ने बदले रिश्ते को स्वीकार नहीं किया. एश्वर्या के लिए तेजप्रताप हैसियत में कोई बड़े नहीं हैं जबकि चंद्रिका राय के लिए लालू की हैसियत ज़रूर बड़ी थी. तेजप्रताप लालू की हैसियत के आईने में एश्वर्या को नहीं देख सकते थे क्योंकि एश्वर्या बराबरी के व्यवहार से कम नहीं चाहती होंगी. दिक़्क़त यहीं हो रही है.''
हालांकि वो कहते हैं कि पूरे विवाद में राबड़ी देवी सबसे अहम भूमिका अदा कर रही हैं. लालू परिवार को जानने वाले लोगों का कहना है कि राबड़ी ने चीज़ों को संभाल कर रखा है नहीं तो तेज प्रताप का बागी तेवर और मुश्किल खड़ा कर सकता था.
पूरे विवाद में आरजेडी के शुभचिंतकों का कहना है कि अगर लालू जेल में ना होते तो सब कुछ नियंत्रण में होता. ये लोग लालू की कमी साफ़ तौर पर महसूस कर रहे हैं.
जहानाबाद से तेज प्रताप ने चंद्र प्रकाश को अपना उम्मीदवार बनाया है जबकि आरजेडी के आधिकारिक उम्मीदवार सुरेंद्र प्रसाद यादव हैं. सुरेंद्र प्रसाद यादव जहानाबाद से आरजेडी के पहले भी सांसद रह चुके हैं.
जहानाबाद के स्थानीय पत्रकार अश्विनी कुमार मानते हैं कि अगर चंद्र प्रकाश चुनाव में डटे रहे तो आरजेडी को नुक़सान हो सकता है. चंद्र प्रकाश भी जाति से यादव ही हैं और इनके बारे में कहा जाता है कि ये तेज़प्रताप के बहुत अच्छे दोस्त हैं. कहा जा रहा है कि तेज प्रताप यहां चुनाव प्रचार करने आएंगे.
चंद्र प्रकाश ने बीबीसी से कहा, ''जहानाबाद में लड़ाई स्थानीय और बाहरी की है. आरजेडी ने सुरेंद्र प्रसाद यादव को उम्मीदवार बनाया है लेकिन वो यहां के नहीं हैं. हमने टिकट को लेकर तेजस्वी जी से भी संपर्क करने कोशिश की थी लेकिन उनसे बात नहीं हुई. कोई बात नहीं बनी तब तेज प्रताप जी ने यह क़दम उठाया.''