फिर भी, महंगाई नियंत्रण में है. सरकार की ओर से इन्फ़्रास्ट्रक्चर और लोक निर्माण में ख़र्च करने से अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है. इस वित्त वर्ष
में जीडीपी की रफ़्तार 6.8 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई गई है.
मगर यह बात भी तथ्य है कि अगर लाखों लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालना है तो भारत की जीडीपी को 7 फ़ीसदी से अधिक रफ़्तार से आगे बढ़ना होगा.
मोदी ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में बदलाव लाने की प्रक्रिया प्रगति पर है. ये चुनाव तय करेंगे कि इसके लिए जनता उन्हें और समय देने के लिए मूड में है या नहीं.
8. जनवाद पर चल रही हैं पार्टियां
अर्थशास्त्री राथिन रॉय कहते हैं कि भारत 'विकास पर ध्यान
दुर्भाग्य से राष्ट्रवाद के अति प्रचार ने कट्टरपंथी दक्षिणपंथी समूहों को गाय की तस्करी करने के संदेह में मुस्लिमों की लिंचिंग करने के लिए प्रोत्साहित कर दिया है.
हिंदू गाय को पवित्र मानते हैं. पशुवध रोधी क़ानूनों को कड़ाई से लागू किए जाने के कारण गाय भी ध्रुवीकरण करने वाली पशु बन गई है.
कट्टरपंथी हिंदूवाद के आलोचकों को देशद्रोही कहा जा रहा है. असहमति जताने वालों को आंखें दिखाई जाती हैं.
बहुत से लोग कहते हैं कि भारत के 17 करोड़ मुसलमान 'अदृश्य' अल्पसंख्यक बन गए हैं. निचले सदन में बीजेपी का कोई सांसद मुसलमान नहीं है. 2014 में इसने सात मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे और वे सभी हार गए थे.
भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में भारतीय सुरक्षा बलों पर हुए घातक आत्मघाती हमले के बाद फ़रवरी महीने के अंत में भारत और पाकिस्तान की ओर से एक-दूसरे पर बमबारी की गई. इससे कथित राष्ट्रवाद की भावना पैदा हो गई.
मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान स्थित चरमपंथी समूहों ने अगर भारत पर एक भी हमला किया या करवाया तो बदले की कार्रवाई से पीछे नहीं हटा जाएगा.
यह स्पष्ट हो गया था कि मोदी राष्ट्रीय सुरक्षा को अपने चुनाव प्रचार अभियान का आधार बनाएंगे. हालांकि यह काम करेगा या नहीं, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. विपक्ष अभी तक इस मामले में कोई काट लेकर नहीं आ पाया है.
क्या राष्ट्रवादी उबाल में इतनी ताक़त है कि वह बाक़ी मुद्दों को गौण साबित करते हुए मोदी के लिए वोट खींच पाएगा?
देने वाले देश से मुआवज़ा देने वाले देश' की ओर बढ़ रहा है, जहां सरकारें अपनी व्यवस्था की कमियों को छिपाने के लिए जनता की जेबों में नक़दी भर रही हैं.
नतीजा है- पॉप्युलिज़म यानी जनता को लुभाने की होड़.
मोदी सरकार ने किसानों के लिए डायरेक्ट कैश ट्रांसफ़र और क़र्ज़ माफ़ी का एलान किया था. तथाकथित ऊंची जातियों और अन्य धर्मों के लोगों के नौकरियों में आरक्षण का भी वादा किया.
उधर राहुल गांधी ने ऐसी योजना का वादा किया है जिसके तहत सरकार बनने पर वह ग़रीबों की न्यूनतम आय तय करेंगे.
अन्य लोग मतदाताओं को टीवी सेट और लैपटॉप जैसी चीज़ें देने के वादे से लुभा रहे हैं. हालांकि इस बात का कोई साफ़ प्रमाण नहीं है कि इस तरह से प्रलोभन देने से वोट मिलते ही हैं.
9. राष्ट्रवाद बदल सकता है गेम
आलोचकों का कहना है कि मोदी के राष्ट्रवाद के प्रदर्शन और उनकी पार्टी की बहुसंख्यक राजनीति के कारण भारत गहरे विभाजन वाले बेचैन देश में बदल गया है.
हालांकि उनके समर्थकों का कहना है कि मोदी ने अपने आधार को मज़बूत किया है और उसमें ऊर्जा भरी है. वे मानते हैं कि राजनीतिक हिंदुत्व को लेकर शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि भारत 'एक तरह से हिंदुओं का राष्ट्र ही तो है.'
2014 में बीजेपी ने यहां 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल की थी. पिछली बार मोदी के करिश्मे और उनकी पार्टी द्वारा बनाए जातियों के इंद्रधनुषी गठजोड़ ने ही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों को पराजित करने में भूमिका निभाई थी.
बहुजन समाज पार्टी यानी बीएसपी की प्रमुख मायावती हैं जो कि लाखों दलितों की आदर्श हैं. राज्य की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी क़रीब 20 फ़ीसदी है.
अब मायावती ने अपनी धुर विरोधी पार्टी समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया है जो आंशिक रूप से समाजवादी हैं. दोनों को उम्मीद है कि वे 50 सीटें जीतकर बीजेपी को फिर दिल्ली की सत्ता पर आने से रोक देंगे.
यह एक अवसर को देखकर बनाया गया गठबंधन है जिसमें कड़वी दुश्मनी को मिठास भरी दोस्ती में बदल दिया गया. मगर यह गठजोड़ उत्तर प्रदेश में बीजेपी को झटका दे सकता है. बीजेपी की उम्मीदें अब मोदी पर ही टिकी हैं कि कैसे वह इस गठबंधन को बेअसर करते हैं.
मगर यह बात भी तथ्य है कि अगर लाखों लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालना है तो भारत की जीडीपी को 7 फ़ीसदी से अधिक रफ़्तार से आगे बढ़ना होगा.
मोदी ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में बदलाव लाने की प्रक्रिया प्रगति पर है. ये चुनाव तय करेंगे कि इसके लिए जनता उन्हें और समय देने के लिए मूड में है या नहीं.
8. जनवाद पर चल रही हैं पार्टियां
अर्थशास्त्री राथिन रॉय कहते हैं कि भारत 'विकास पर ध्यान
दुर्भाग्य से राष्ट्रवाद के अति प्रचार ने कट्टरपंथी दक्षिणपंथी समूहों को गाय की तस्करी करने के संदेह में मुस्लिमों की लिंचिंग करने के लिए प्रोत्साहित कर दिया है.
हिंदू गाय को पवित्र मानते हैं. पशुवध रोधी क़ानूनों को कड़ाई से लागू किए जाने के कारण गाय भी ध्रुवीकरण करने वाली पशु बन गई है.
कट्टरपंथी हिंदूवाद के आलोचकों को देशद्रोही कहा जा रहा है. असहमति जताने वालों को आंखें दिखाई जाती हैं.
बहुत से लोग कहते हैं कि भारत के 17 करोड़ मुसलमान 'अदृश्य' अल्पसंख्यक बन गए हैं. निचले सदन में बीजेपी का कोई सांसद मुसलमान नहीं है. 2014 में इसने सात मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे और वे सभी हार गए थे.
भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में भारतीय सुरक्षा बलों पर हुए घातक आत्मघाती हमले के बाद फ़रवरी महीने के अंत में भारत और पाकिस्तान की ओर से एक-दूसरे पर बमबारी की गई. इससे कथित राष्ट्रवाद की भावना पैदा हो गई.
मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान स्थित चरमपंथी समूहों ने अगर भारत पर एक भी हमला किया या करवाया तो बदले की कार्रवाई से पीछे नहीं हटा जाएगा.
यह स्पष्ट हो गया था कि मोदी राष्ट्रीय सुरक्षा को अपने चुनाव प्रचार अभियान का आधार बनाएंगे. हालांकि यह काम करेगा या नहीं, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. विपक्ष अभी तक इस मामले में कोई काट लेकर नहीं आ पाया है.
क्या राष्ट्रवादी उबाल में इतनी ताक़त है कि वह बाक़ी मुद्दों को गौण साबित करते हुए मोदी के लिए वोट खींच पाएगा?
देने वाले देश से मुआवज़ा देने वाले देश' की ओर बढ़ रहा है, जहां सरकारें अपनी व्यवस्था की कमियों को छिपाने के लिए जनता की जेबों में नक़दी भर रही हैं.
नतीजा है- पॉप्युलिज़म यानी जनता को लुभाने की होड़.
मोदी सरकार ने किसानों के लिए डायरेक्ट कैश ट्रांसफ़र और क़र्ज़ माफ़ी का एलान किया था. तथाकथित ऊंची जातियों और अन्य धर्मों के लोगों के नौकरियों में आरक्षण का भी वादा किया.
उधर राहुल गांधी ने ऐसी योजना का वादा किया है जिसके तहत सरकार बनने पर वह ग़रीबों की न्यूनतम आय तय करेंगे.
अन्य लोग मतदाताओं को टीवी सेट और लैपटॉप जैसी चीज़ें देने के वादे से लुभा रहे हैं. हालांकि इस बात का कोई साफ़ प्रमाण नहीं है कि इस तरह से प्रलोभन देने से वोट मिलते ही हैं.
9. राष्ट्रवाद बदल सकता है गेम
आलोचकों का कहना है कि मोदी के राष्ट्रवाद के प्रदर्शन और उनकी पार्टी की बहुसंख्यक राजनीति के कारण भारत गहरे विभाजन वाले बेचैन देश में बदल गया है.
हालांकि उनके समर्थकों का कहना है कि मोदी ने अपने आधार को मज़बूत किया है और उसमें ऊर्जा भरी है. वे मानते हैं कि राजनीतिक हिंदुत्व को लेकर शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि भारत 'एक तरह से हिंदुओं का राष्ट्र ही तो है.'
2014 में बीजेपी ने यहां 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल की थी. पिछली बार मोदी के करिश्मे और उनकी पार्टी द्वारा बनाए जातियों के इंद्रधनुषी गठजोड़ ने ही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों को पराजित करने में भूमिका निभाई थी.
बहुजन समाज पार्टी यानी बीएसपी की प्रमुख मायावती हैं जो कि लाखों दलितों की आदर्श हैं. राज्य की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी क़रीब 20 फ़ीसदी है.
अब मायावती ने अपनी धुर विरोधी पार्टी समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया है जो आंशिक रूप से समाजवादी हैं. दोनों को उम्मीद है कि वे 50 सीटें जीतकर बीजेपी को फिर दिल्ली की सत्ता पर आने से रोक देंगे.
यह एक अवसर को देखकर बनाया गया गठबंधन है जिसमें कड़वी दुश्मनी को मिठास भरी दोस्ती में बदल दिया गया. मगर यह गठजोड़ उत्तर प्रदेश में बीजेपी को झटका दे सकता है. बीजेपी की उम्मीदें अब मोदी पर ही टिकी हैं कि कैसे वह इस गठबंधन को बेअसर करते हैं.