Thursday, December 20, 2018

التغير المناخي: خمسة أشياء عرفناها من كوب 24

توصلت الوفود المشاركة في مؤتمر الأمم المتحدة للمناخ في بولندا إلى اتفاق، حول كيفية تنفيذ اتفاق باريس بشأن المناخ، الموقع عام 2015، والذي سيدخل حيز التنفيذ عام 2020.
مات ماكغراث، مراسل بي بي سي لشؤون البيئة، يلخص النقاط الرئيسية التي أبرزها المؤتمر المعروف اختصارا بـ"كوب 24".


على الرغم من أنها قد تكون مملة، إلا أن القواعد التنفيذية لاتفاق باريس 2015 ستحدد الطريقة، التي سيكافح بها العالم التغير المناخي خلال العقود القادمة.
الشيئ الرئيسي هو عدم تفكيك اتفاق باريس، الذي جرى التفاوض عليه بحرص، عن طريق تقسيم القواعد إلى مجموعتين، إحداهما للدول الغنية وأخرى للدول الفقيرة.
وبهذا المقياس، كان من علامات نجاح المؤتمر إظهار الصين القيادة، بعدم الدفع نحو العودة إلى الأساليب القديمة لتقسيم الدول، إلى دول فعلت وأخرى لم تفعل.
الإبقاء على الجميع متفقين حول نفس الأفكار جعل المفوض الأوربي للمناخ، ميغيل آرياس كانيتي، في منتهى السعادة.
وقال كانيتي: "لدينا نظام من الشفافية، نظام من الإبلاغ، لدينا قواعد لقياس الانبعاثات، وقياس أثر سياساتنا مقارنة بما يوصي به العلم".

2: العلم يستحق النضال من أجله

أحد أهم الخلافات في هذا المؤتمر كان حول تقرير علمي، للجنة الحكومية الدولية المعنية بالتغير المناخي، المعروفة اختصار باسم "أي بي سي سي".
وانتهت الجهود الرامية إلى إيجاد حلول وسط بالفشل، لكن ذلك لك يكن نهاية الأمر.
وشعرت الغالبية العظمى من الدول بأن الاعتراف بالعلم أمر حاسم، في هذا المؤتمر.
وقد نجحت جهودهم في النهاية في ضمان الاعتراف، باللجنة الحكومية الدولية المعنية بتغير المناخ.

3: الروح الدولية لا تزال حية

شعرت دزل كثيرة بالقلق، في ظل صعود القومية في كثير من الدول، ومع انتخاب "جير بولسونارو" رئيسا للبرازيل مؤخرا، ساد قلق من أن التعاون الدولي اللازم لمكافحة التغير المناخي ربما يكون في خطر.
بالنسبة للكثيرين، فإن التوصل لاتفاق، هنا في مدينة "كاتوفيتسه" البولندية، كان مرتبطا بدرجة أقل بالتوصل إلى قواعد تقنية، وبدرجة أكبر بإظهار أن الروح الدولية لا تزال حية ولها تأثير.

4: مكسب للعملية وليس للكوكب

بينما كان المفاوضون يتبادلون التهاني، على نجاحهم في تأدية مهمتهم على نحو جيد، بإصدار القواعد التنظيمية، كان هناك العديد من الأصوات تشعر بأن الاتفاق لم يذهب إلى الحد المطلوب.
إنهم يشيرون إلى قوة العلم، والاعتراف العلني بانعكاس التغير المناخي، الذي شوهد هذا العام في موجات حارة وحرائق غابات.
يعتقد كثير من النشطاء المدافعين عن البيئة إن "كاتوفيتسه" كانت فرصة، لتحرك راديكالي.
ويقول محمد أدو من منظمة "كريستيان إيد" الخيرية: "لقد انتهينا هنا إلى معرض لتجارة الفحم، أكثر منه اتفاق بشأن المناخ"، وذلك في إشارة إلى جهود للترويج للفحم، من جانب بولندا والولايات المتحدة خلال المؤتمر.

5: ظهور أصوات جديدة

واحد من أكثر الأشياء اللافتة للنظر، في هذه الدورة، هو حضور شباب كلهم حيوية، بأعداد كبيرة جدا مقارنة بأي نسخة سابقة من المؤتمر.

Monday, November 12, 2018

बहुत खूब, पूर्व मंत्री है फरार और किसी को नहीं पता, अब बहुत हुआ

मुजफ्फरपुर बालिका गृह मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस को फटकार लगाई है। कोर्ट ने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि पुलिस पूर्व मंत्री मंजू वर्मा को गिरफ्तार करने में नाकाम रही है। बता दें मंजू वर्मा के घर से गोला-बारूद बरामद हुए थे। मंजू वर्मा की अग्रिम जमानत की अर्जी भी काफी पहले ही खारिज हो चुकी है। जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा, 'बहुत खूब! कैबिनेट मंत्री मंजू वर्मा फरार हैं, बहुत खूब। यह कैसे हुआ कि मंत्री फरार है और किसी को नहीं पता कि वह कहां है। मुद्दे की गंभीरता का अहसास करें कि मंत्री मिल नहीं रही है। यह बहुत हुआ।'

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, 'हम आश्चर्यचकित हैं कि एक महीने से भी अधिक समय हो गया और पुलिस पूर्व मंत्री के बारे में पता नहीं लगा पाई। हम पुलिस को यह बताना चाहते हैं कि इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति के बारे में कैसे पता नहीं चल पाया है।' कोर्ट ने डीजीपी को अपने सामने पेश होने के लिए भी कहा।' अब मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी।

इससे पहले कोर्ट ने वर्मा की गिरफ्तारी न होने पर कहा था, 'बिहार में कुछ भी ठीक नहीं है। पूर्व मंत्री छुपी हुई हैं और सरकार को पता ही नहीं है। मंत्री की जमानत याचिका खारिज होने के बाद भी सरकार उन्हें गिरफ्तार करने में नाकाम रही है।' कोर्ट ने कहा था कि बिहार में कुछ भी ठीक नहीं है।

पीठ ने मंजू वर्मा को लेकर कहा था कि उनकी अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज हो गई है। फिर अब तक उनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई। पीठ ने बिहार सरकार से जवाब दाखिल करने के लिए भी कहा था।

ये है पूरा हमला

बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह में 34 लड़कियों के साथ रेप का खुलासा होने के बाद ही राजनीतिक बहस तेज हो गई थी। इस कांड का खुलासा टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज (टीआईएसएस) की रिपोर्ट में हुआ। जब सरकार पर विपक्षी पार्टियों और लोगों का दबाव बढ़ा तो इस मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश की गई। अभी हाल ही में मुजफ्फरपुर के बालिका गृह से 15 साल की बच्ची का भी कंकाल मिला है। जिससे मामले में नया मोड़ आ गया है।अमेरिका ने बांग्लादेश से रोहिंग्या शरणार्थियों की म्यामांर में स्वैच्छिक और सम्मानजनक वापसी की मांग करते हुए कहा कि ढाका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें तमाम गतिविधियों की स्वतंत्रता हो और वे ‘शिविरों तक ही सीमित ना रहें।’ ढाका और ने पी तौ के बीच पिछले महीने लाखों रोहिंग्या मुस्लिमों की मध्य नवंबर में देश वापसी पर सहमति बनी थी। 
यह रोहिंग्या शरणार्थी म्यामांर सेना के चलाए गए अभियान के बाद देश छोड़कर बांग्लादेश चले गए थे। समझौते के तहत पहले जत्थे में बांग्लादेश से 2,000 रोहिंग्या मुसलमान म्यांमा जाएंगे। इसके बाद दूसरा जत्था रवाना होगा। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने रविवार को एक बयान में कहा कि हमने दोनों सरकारों के उच्च स्तर के अधिकारियों को समय से पहले वापसी को लेकर अपनी गंभीर चिंताओं से अवगत करा दिया है। 

इस बात पर जोर दिया गया कि अंतरराष्ट्रीय परिपाटी के अनुरूप स्वैच्छिक, सुरक्षित, और सम्मानित तरीके से वापसी हो। इसके अलावा म्यामां वापसी के बाद उन्हें तमाम गतिविधियों की आजादी हो और वे शिविरों तक ही सीमित ना रहें। साथ ही, विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र में शरणार्थियों के उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) के उस आकलन से भी सहमत है, जिसमें कहा गया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी के लिए म्यामां में स्थिति अभी पूरी तरह अनुकूल नहीं है।

Wednesday, October 10, 2018

अपने तरीके सुधारें दोनों पक्ष

राफेल सौदे में कुछ स्पष्टता की आवश्यकता जरूर महसूस होती है. इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय वायुसेना को आधुनिक लड़ाकू विमानों की बहुत जरूरत है और उन्हें हासिल करने जैसे हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा से संबद्ध अहम फैसले टालते जाने की यूपीए सरकार और उसमें भी उसके रक्षा मंत्री एके एंटनी की प्रवृत्ति की वजह से इसमें बहुत देर हो गयी. 
 
पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा दिसंबर, 2012 में जिस सौदे की बातचीत की गयी, उसमें कीमत तथा रणनीतिक जरूरतों के लिहाज से राफेल सबसे स्वीकार्य समझा गया था. इस सौदे के अंतर्गत 18 विमान तो फ्रांस से उड़कर ही आने थे, जबकि 118 विमानों का निर्माण हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा भारत में ही किया जाना था. मार्च, 2014 में पक्के किये गये इस करार की कुल लागत 36 हजार करोड़ रुपये थी, जिसके अंतर्गत सार्वजनिक की गयी प्रति विमान की कीमत 526.1 करोड़ रुपये थी. 
 
यह भी एक सच्चाई है कि अप्रैल 2015 के अपने फ्रांसीसी दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्ववर्ती करार को रद्द करते हुए यह घोषणा की कि कुल 1670 करोड़ रुपये प्रति विमान की लागत पर 36 विमान सीधे तैयार हालत में खरीदे जायेंगे. 
 
यह नयी दर पहले वाले सौदे से मोटे तौर पर तीन गुना अधिक थी. दासौं एविएशन के वर्ष 2016 की वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज होने की वजह से इस कीमत की जानकारी सार्वजनिक डोमेन में है. पुनरीक्षित सौदे के अंतर्गत भारतीय साझीदार के रूप में एचएएल को छोड़ दिया गया. फिर दासौं ने बहुत सारी भारतीय कंपनियों से साझीदारी के समझौते किये, जिनमें अनिल अंबानी का रिलायंस समूह सर्वप्रमुख था.
 
अब विपक्ष सरकार से यह पूछ रहा है कि नये सौदे में क्यों इसकी कीमत तीन गुनी अधिक हो गयी. विपक्ष यह भी जानना चाह रहा है कि क्यों एचएएल द्वारा निर्माण के विकल्प को छोड़ साझीदारों के रूप में कई अन्य कंपनियों के साथ रिलायंस समूह को चुना गया. 
 
सरकार का उत्तर है कि यह एक अंतर-सरकारी करार था, जिसमें कोई भी बिचौलिया शामिल नहीं था; विमान में लगायी गयी अत्याधुनिक शस्त्र प्रणालियों तथा उपकरणों को देखते हुए उसकी कीमत वस्तुतः सस्ती है और दासौं द्वारा अपने साझीदारों के रूप में अन्य कई कंपनियों के साथ रिलायंस समूह के चयन में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.
 
इन दो बिल्कुल विपरीत नजरिये के मध्य एक पूर्ण युद्ध जैसे हालात बने हैं. विपक्ष की कोशिश है कि भ्रष्टाचार, पारस्परिक लाभ एवं रक्षा खरीद प्रक्रियाओं के उल्लंघन के आरोप लगाकर राफेल को वर्तमान सरकार का ‘बोफोर्स’ बना दिया जाये. 
 
सच तो यह है कि विपक्ष के आरोपों में यदि सच्चाई हो, तो भी उनका प्रचार कर वह कोई बहुत अच्छा काम नहीं कर रहा. सामान्य जन के लिए विपक्ष का यह नजरिया स्वीकार्य नहीं हो सका है कि रक्षा सौदों में भारी गड़बड़ी हुई है. न तो यह कोई राष्ट्रीय मुद्दा बन सका है, न ही यह उस स्तर के निकट पहुंच सका है, जहां बोफोर्स को ले जाया गया था और न ही प्रधानमंत्री या उनकी सरकार की विश्वसनीयता पर उनका कोई असर पड़ता दिखता है. 
 
सरकार भी अपना बचाव भलीभांति करती नजर नहीं आती. गोपनीयता के नियम का हवाला देकर इन विमानों की पुनरीक्षित कीमत उजागर न करने की उसकी शुरुआती कोशिश शायद ही विश्वसनीय थी, क्योंकि ज्यादातर जानकारियां तो पहले ही सार्वजनिक हो चुकी हैं
 
उसके द्वारा एक के बाद दूसरे विरोधाभासी बयानों से यह धारणा ही बलवती हुई कि कहीं कुछ है, जिसे वह छिपा रही है. पहले तो यह कहा गया कि इस मामले में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी और यह पूरी तरह दासौं का निर्णय था. 
 
फिर जब पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति ओलांद ने यह कह दिया कि एक साझीदार के रूप में अनिल अंबानी का चुनाव केवल भारतीय पक्ष के कहने पर ही किया गया था, तो रक्षा मंत्री ने वस्तुतः यह आरोप लगा दिया कि राहुल गांधी एवं ओलांद ने मिलकर भारत सरकार को बदनाम करने की साजिश की है. सच कहा जाये, तो एक मित्र देश के पूर्व राष्ट्राध्यक्ष पर ऐसे आरोप मढ़ देना हास्यास्पद ही है.
 
सरकार के लिए सबसे अच्छा रास्ता यह होगा कि वह पारदर्शिता का विकल्प चुने. यदि उसने कुछ भी गलत नहीं किया है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा सरोकारों के मद्देनजर वह जिस सीमा तक जानकारी साझा कर सकती है, क्यों न वह उसे कर ही डाले? 
 
जहां तक उचित हो, विमान की कीमत से संबद्ध सभी तथ्य सार्वजनिक जानकारी में लाये जाने चाहिए. राफेल की कीमत तीन गुना तक बढ़ने और किसी खास कॉरपोरेट घराने को साझीदार के रूप में चुने जाने को लेकर उपजे संदेह का विश्वसनीय तरीके से निराकरण किया जाना चाहिए और इस विषय पर किसी भी मंत्री द्वारा बोले जाने की बजाय केवल रक्षा मंत्री अथवा स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा बोला जाना चाहिए.
 
गोपनीयता की हर कोशिश से रक्षा घोटाले के आरोपों को बल मिलता है. यदि सरकार को अपनी निर्दोषिता का इतना ही भरोसा है, तो यह एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) द्वारा इसकी जांच को भी तैयार हो सकती है. इसे पहले भी जेपीसी गठित की जा चुकी है और खुद भाजपा ही इसकी सबसे अधिक मांग करती रही है.
(अनुवाद: विजय नंदन)

Thursday, September 27, 2018

स्मार्टफ़ोन की लत से छुटकारा दिलाता एक फ़ोन

बात 2008 की है, जब नॉर्वे के उद्यमी पेट्टर नेबी और उनकी सौतेली बेटी को ये एहसास हुआ कि उनके फ़ोन, उनके रिश्ते में दरार डाल रहे हैं. वो खाने के वक़्त अपने सेल फ़ोन पर नज़र गड़ाए रहते थे. बिस्तर पर जाने से पहले और घर में टहलते हुए भी फ़ोन पर ही व्यस्त रहते थे.
ये एक ऐसा नशा था, जिस के जाल से वो निकल नहीं पा रहे थे. ये ऐसी लत थी जैसे चॉकलेट खाने की आदत. आख़िरकार नेबी को पता चल गया कि अपनी सौतेली बेटी से दोबारा रिश्ता मज़बूत करने के लिए उन्हें फ़ोन को बीच से हटाना होगा.
वो कहते हैं कि, 'मैं बहुत स्वादिष्ट चॉकलेट को फ्रिज में कैसे रख सकता हूं. अगर वो फ्रिज से बाहर होगी, तो यक़ीनन मैं उसे खाऊंगा.'
कई साल की लत के बाद आख़िरकार नेबी ने इस से छुटकारा पाने का तरीक़ा खोज ही निकाला. उन्होंने अपने स्मार्टफ़ोन को बदलकर एक नया मोबाइल लेने का फ़ैसला किया. लेकिन, पहले उनके पास जो ब्लैकबेरी फ़ोन था, उसकी जगह नेबी ने जो फ़ोन बनाया वो रिश्तों के लिए सेहतमंद था.
फ़ोन के बजाय रिश्तों पर ज़ोर देने के इरादे से ही नेबी ने नई कंपनी बनाई पुंक्ट.
आज पुंक्ट दुनिया की उन स्टार्ट अप कंपनियों में से एक है, जो तकनीक में छोटे-छोटे बदलाव लाकर चिंता और लत से छुटकारा दिलाने का काम कर रही है. ये तकनीक लोगों को स्मार्टफ़ोन की लत से निजात दिलाने की है. लोगों को दो क़दम आगे नहीं, पीछे ले जाने की बात करती है.
अब ये नए ज़माने के पुराने फ़ोन आप को कॉल करने में मदद करते हैं और कुछ छोटे-मोटे दूसरे काम भी. इन फ़ोन को रखने वाले कहते हैं कि वो नए ज़माने के इन पुराने फ़ोन की वजह से स्मार्टफ़ोन की क़ैद से आज़ाद हो रहे हैं.
ये फ़ोन उन्हें उस दौर में ले जा रहे हैं, जब आईफ़ोन को उनकी हथेली से चिपका दिया गया था.
हालांकि फ़िलहाल जानकार इस बात पर बंटे हुए हैं कि स्मार्टफ़ोन के मुक़ाबले उतारे गए ये बेसिक फ़ोन लोगों के लिए कितने फ़ायदेमंद हैं. और सवाल ये भी है कि क्या फ़ोन हमारे अवचेतन में गहरी जड़ें जमाए बैठी आदतों को बदलने का काम कर सकते हैं? ये हमारे ज्ञान को बढ़ा सकते हैं? लेकिन, इस नए ज़माने के पुराने फ़ोन के समर्थक इन सवालों के जवाब हां में ही देते हैं.
2015 में जो हॉलियर और काईवेई टैंग ने न्यूयॉर्क में द लाइट फ़ोन नाम से एक मोबाइल ईजाद किया. ये नया फ़ोन पुराने ज़माने के मोटे-भद्दे मोबाइल जैसा ही था. जैसा कि 2001: ए स्पेस ओडिसी में दिखाया गया था.
इस फोन में कोई बाहरी की नहीं थी. कैमरा नहीं था और स्क्रीन पर कई ऐप भी नहीं था. इसके बजाय द लाइट फोन में एक डायलपैड है. इसके जरिए कॉल की जा सकती है और रिसीव की जा सकती है. इस फोन के स्पीड डायल में केवल नौ नंबर सेव किए जा सकते हैं.
द लाइट फोन के मुक़ाबले, नेबी का एमपी-01 फोन ज्यादा पेचीदा है. इसमें थ्रीडी बटन लगे हैं. इसके जरिए फोन कॉल के अलावा टेक्स्ट मैसेज किए जा सकते हैं. इस फोन को ब्लूटूथ से कनेक्ट किया जा सकता है. फोन में अलार्म और कैलेंडर भी है.
नीदरलैंड की ट्वेंट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर गीक लडेन इस फोन को डिज़ाइन 'विद गोल' कहती हैं. गीक के मुताबिक़, नए दौर के ये पुराने जैसे फ़ोन आप को बहुत ज़्यादा नहीं उलझाते, क्योंकि इन से आप ज़्यादा काम ले ही नहीं सकते.
ट्वेंट यूनिवर्सिटी के ही थॉमस वान रोम्पे मानते हैं कि ये साधारण फोन ही मोबाइल को लेकर मानवीय बर्ताव में बदलाव ला सकते हैं. आईफ़ोन और दूसरे स्मार्टफोन में लगातार मैसेज और नोटिफिकेशन आते रहते हैं. मजबूरन लोगों को उन्हें उठाना पड़ता है. रोम्पे कहते हैं कि, 'आईफोन लगातार आपका ध्यान अपनी तरफ खींचता रहता है.'
मोबाइल पर निर्भरता का नतीजा ये होता है कि हम लगातार फोन में उलझे रहते हैं. इनके मुक़ाबले लाइट फोन या एमपी-01 नोटिफ़िकेशन दे ही नहीं सकते. बुनियादी काम के सिवा कुछ कर ही नहीं सकते, तो वो आप का ध्यान अपनी तरफ़ नहीं खींचते. ऐसे में ये फ़ोन रखने वाले उन्हें कम ही छुएंगे.
इसका ये मतलब नहीं कि स्मार्टफोन नहीं होंगे, तो नोटिफिकेशन आने पर हमारे अंदर आने वाला उत्साह कम हो जाएगा. अमरीका की मिसौरी यूनिवर्सिटी में मार्केटिंग के प्रोफ़ेसर रहे पीटर ब्लॉच कहते हैं कि स्मार्टफ़ोन से क्रिएटिविटी के बहुत काम नहीं हो सकते. पर अगर हम बेसिक फ़ोन जैसे दिखने वाले द लाइट फ़ोन या एमपी-01 की बात करें, तो ये जज़्बाती तौर पर हमारे बहुत मददगार हो सकते हैं.
प्रोफ़ेसर ब्लोच कहते हैं कि, 'ये फोन आप के लिए बहुत से काम नहीं करेंगे. मगर इनसे अच्छा एहसास होगा.'
ब्लोच के मुताबिक़ जब आप ऐसी चीज़ें ख़रीदते हैं तो आप के बर्ताव में बदलाव आता है. नई चीज़ों से हमारा हेल-मेल हमारे ज़हन पर गहरा असर डालता है.
पीटर ब्लोच ने 1995 में 'जर्नल ऑफ मार्केटिंग' में एक लेख लिखा था. इसमें उन्होंने बताया था कि इंसान का दिमाग़ दो तरीक़े से बर्ताव करता है. जब उसके हाथ कोई नई चीज़ आती है, तो वो उसकी तुलना पहले से मौजूद चीज़ से करता है. फिर जब वो नई चीज़ को इस्तेमाल करता है, तो उसका तजुर्बा ज़हन पर अलग असर डालता है. जैसे कि बहुत से लोग स्पोर्ट्स कार ख़रीदकर अच्छा महसूस करते हैं.
चौड़े से सड़क पर चलने लगते हैं. लेकिन उन्हें लगता है कि एमपी-01 या द लाइट फोन इतने साधारण हैं कि शायद वो लोगों के ज़हन पर अच्छा असर न छोड़ पाएं. वो कहते हैं कि किसी भी नई चीज़ में लुभाने वाली कोई बात तो होनी चाहिए. आप जिस चीज़ से दूर रह सकते हैं और इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो बहुत ज़्यादा लोग उसकी तरफ़ नहीं खिंचेंगे.